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बढते कदम

सफलता की सच्ची कहानियाँ…

मन की बात

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 31 दिसम्बर 2017 को प्रसारित मन की बात कार्यक्रम का राजस्थान स्थित अलवर] सवाईमाधोपुर कोटा  और बाड़मेर इकाईयों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष प्रचार किया गया। इस दौरान रेडियो और टीवी के माध्यम से मन की बात का प्रसारण किया गया।  इस अवसर पर ग्रामीणजनों के बीच मन की बात को लेकर समूह चर्चा आयोजित की गयी। बाड़मेर जिले के महाबार आदर्श महाबार और रानीगाँव  में पहली बार ऐसे कार्यक्रम हुए। ये गाँव भारत पाकिस्तान सीमा के पास हैं। इसी प्रकार सवाईमाधोपुर जिले के वन क्षेत्र के गाँव में ये कार्यक्रम हुए। कुल 8 गाँव कवर किये गये जिनमें 89 लोगों से जनप्रतिक्रिया संग्रह की गयी। आम तौर पर लोगों ने स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण की प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता को सराहा। इस दौरान स्थानीय समस्याऐं जैसे रोजगार अकाल और वन क्षेत्र में जंगली जानवरों के कारण होने वाली परेशानियों के मुद्दों को लोगों ने उठाया और आग्रह किया कि मन की बात कार्यक्रमों में इन्हें भी शामिल किया जाना चाहिये। उपरोक्त कार्यक्रमों का ट्विटर और प्रादेशिक कार्यालय राजस्थान के ब्लाग पर प्रचार प्रसार भी किया गया।

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स्वयं सहायता समूह से मिली आत्मनिर्भरता

 ग्रामीन क्षेत्र में रोजगार की उपलब्धता बहुत बड़ी समस्या है। अलवर ज़िले के किशनगढ़बास ब्लॉक के ग्राम जागता बसई की संतोष देवी को भी अपने परिवार के भरण पोषण, बच्चों की अच्छी शिक्षा, सामाजिक ज़िम्मेदारी के लिए आमदनी की आवश्यकता थी, पति के खेत में मजदूरी करने से यह संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे में संतोष देवी को ग्राम के पंजाब नेशनल बैंक द्वारा स्वयं सहायता समूह के माध्यम से पशु खरीदने के लिए ऋण की उपलब्धता कराये जाने के बारे में जानकारी मिली। ग्राम में आंगनबाड़ी केंद्र में चलने वाले तारा स्वयं सहायता समूह से जुडने के बाद उन्हें भैंस खरीद के लिए रूपये 50,000/- का ऋण मिला। इस राशि से उन्होने गत वर्ष एक भैंस खरीदी। गाँव में सहकारी समिति के माध्यम से दूध बेच कर व ऋण किश्त चुकाने के बाद लाभ भी हुआ। परिवार के लिए अतिरिक्त आमदनी भी हुई जिससे उनके आर्थिक हालत  में भी सुधार आया।। अब सब्सिडी के बाद वर्तमान में कुछ राशि कि किश्तें ही शेष बची हैं। आज उनके पास दो भैंस हो गयी है। परिवार कि आमदनी बढ़ जाने से संतोष अब पहले से अधिक बच्चों की शिक्षा, भरण पोषण पर खर्च कर पाती हैं। अब स्वयं भी आत्मनिर्भर भी हो गयी हैं, इसका श्रेय वे बैंक की कल्याणकारी योजनाओं को देती है।

संजय बूलचंदनी, क्षेत्रीय प्रचार सहायक, अलवर

 

नयी तकनीक एवं देशी खाद से बढ़ाई पैदावार

नयी तकनीक एवं देशी खाद के उपयोग से जालोर जिले के अगवरी के किसान शांति लाल सुथार ने  बागवानी के क्षेत्र में 45 बीघा जमीन में 3000 अनार एवं 900 नींबू के पेड़ों एवं अन्य फसलों से अपनी पहचान प्रगतिशील किसान के रूप में बनाई है। शांति लाल सुथार  बागवानी में मजदूरों के साथ स्वयं भी हर पेड़ एवं बागवानी के कार्य की रोजाना निगरानी करने के साथ आधुनिक कृषि एवं बागवानी के नये नये तरीकों एवं जरूरत अनुसार मिट्टी पानी की जांच भी करवाते है। शांति लाल के बग़ीचे में तैयार अनार की प्रसिद्धि आस-पास के क्षेत्र में बेदाना सीड के नाम से प्रसिद्ध है तथा नींबू भी उनके बगीचे में सालभर मिल जाते है। शांतिलाल को अनार एवं नींबू से सालाना करीब 15 लाख रुपये की आमदनी हो जाती है उसी से उन्होने अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रहने के लिए मकान की सुविधा प्रदान की  है । शांतिलाल की प्रसिद्धि के चलते कृषि विभाग जालोर ने उन्हें वर्ष 2014-15 में उन्नत कृषक घोषित किया। जून 2016 में उनको राजस्थान सरकार ने कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी के नेतृत्व में 11 सदस्यों के दल के साथ सात दिन के लिए इजरायल में कृषि एवं पशुपालन के कार्यों को देखने के लिए भिजवाया।  शांति लाल सुथार ने बताया कि इजरायल में एक एक बूंद पानी का सदुपयोग होता है। वहीं पशुपालन में ऐसी नस्ल राखी जाती है जो रोजाना पचास लीटर से अधिक दूध देती है। इन सभी का किसान एवं पशुपालक रोजाना का  कम्प्युटर में हिसाब रखते हैं ।

नरेंद्र कुमार, तकनीकी सहायक, बाड़मेर

 

घर बैठे कमाई

कोटा ज़िले के कैथून में कोटा डोरिया का काम सालों से चला आ रहा है। इस बुनाई के काम से कई परिवारों को रोजगार मिला हुआ है। जिसमे से एक है दिल अफरोश का परिवार। यह परिवार पीढ़ियों से कोटा डोरिया के काम को बखूबी ज़िम्मेदारी से निभाता आ रहा है। इनके द्वारा बनाई गई साड़ी, दुपट्टा, शाल, सलवार सूट आदि कोटा ही नहीं अपितु देश के कई बड़े शहरों में जाते है, जिसमे कोटा शहर को कोचिंग नगरी के नाम के साथ कोटा डोरिया साड़ी नाम से भी पहचान दिलवाई है। दिल अफरोश घर के काम को निपटाने के बाद बुनाई के काम को करती है और महीने के कम से कम 3000 रुपए कमा लेती है, जिससे परिवार के खर्च में हाथ बंट जाता है।

प्रेम सिंह, क्षेत्रीय प्रचार सहायक, कोटा

आदत में बदलाव आ रहा है

क्षेत्रीय प्रचार निदेशलय, कोटा द्वारा छबड़ा नगर पालिका के अंबेडकर भवन में आयोजित नए भारत का मंथन, संकल्प से सिद्धी कार्यक्रम में राम प्रसाद सहरिया ने बताया की वह वार्ड नंबर 2 में निवास करता है परिवार के सदस्यों का भरण पोषण वह मजदूरी करके करता है, किसी समय स्वास्थ्य खराब होने पर रात बिरात में शौच करने के लिए बाहर जाने में बड़ा डर लगता था कि कुछ अनहोनी घटित न हो जाए, किसी परिचित ने बताया कि सरकार शौचालय बनाने के लिए रुपये 12000 प्रोत्साहन राशि दे रही है, शौचालय निर्माण करने के बाद पूरा परिवार उस का उपभोग कर रहा है, यह एक अच्छी योजना है जो खुले में शौच करने से मुक्त करती है।

इसी प्रकार बृजेश कुमार का परिवार बाराँ ज़िले के छबड़ा में निवास करता है नगर पालिका में नौकरी करने के पश्चात भी अपने वेतन में से बचाकर वह शौचालय नहीं बना सकता था, भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण के लिए मिलने वाली 12000 रुपये की प्रोत्साहन राशि से ही  शौचालय का निर्माण कराकर परिवार के 6 सदस्य उसका उपयोग ले रहे है, जो स्वच्छता की दृस्ति से बहुत लाभकारी है।

प्रेम सिंह, क्षेत्रीय प्रचार सहायक, कोटा

हजारों लोगों की प्यास बुझा रहा है कांसोलाव तालाब

मरुस्थलीय क्षेत्र और कम बरसात के कारण पश्चिमी राजस्थान में पेयजल के परंपरागत स्रोतों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है । इनमे बावड़ियाँ, नाड़ी, टांके, तालाब और ताल-तलैया प्रमुख है। नागौर के रोल गाँव में इसी तरह का एक तालाब अपनी एतिहासिकता और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल है। जिससे आप कांसोलाव तालाब के नाम से जाना जाता है। यह तालाब रोल गाँव के 10 हजार लोगों को वर्ष भर जलापूर्ति करता है। साथ ही आपातकाल में समीप के 12 गाँव के लिए भी भागीरथी का काम भी कर रहा है।

कांसोलाव तालाब का नामकरण और अस्तित्व में आने के पीछे सल्तनत काल में मोहम्मद साहब को चौला लेकर रोल पहुंचे एक ओलिया काजी हमीदुद्दीन नागोरी का करिश्माई व्यक्तित्व बताया जाता है। रियासत काल में रोल गाँव बंजारों के व्यापार मार्ग का प्रसिद्ध पड़ाव था। कहा जाता है कि व्यापारियों का एक दल यात्रा के दौरान प्यास से व्याकुल होकर पीर पहाड़ी पर काजी  हमीदुद्दीन नागोरी कि कुटिया में पानी की आस लेकर पहुंचे। काजी हमीदुद्दीन नागोरी ने कांसे का बर्तन देकर पहाड़ी से वर्तमान तालाब वाली जगह पर बने गड्ढे से पानी निकालने का फरमान दिया । व्यापारियों ने वैसा ही किया अपने दल कि प्यास बुझाई।  कांसोलाव तालाब अस्तित्व में आया।

कांसोलाव तालाब का जल ग्रहण क्षेत्र काजी हमीदुद्दीन नागोरी कि पीर पहाड़ी से लेकर लगभग 50 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है। तालाब के तले में चिकनी मिट्टी होने के कारण एक बार भरने के बाद वर्ष भर पानी  बना रहता है। तालाब के  उत्तरी किनारे पर हासन कासम बापजी कि मस्जिद है, पूर्व में नृसिंह भगवान का मंदिर है और  पश्चिम में शिवालय स्थित है। रोल गाँव के लोगों कि दिनचर्या  कांसोलाव तालाब से ही शुरू होती है सुबह से ही महिलाओं के समूह तालाब की ओर आते-जाते देखे जा सकते हैं। सायंकाल में यह नजारा देखते ही बनता है। महिलाओं की टोलियाँ पानी के बहाने घाटों पर जमकर बतियाती हैं और अपने सुख दुख में शामिल होकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती हैं।

राजेश कुमार मीना, क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी, जोधपुर

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